एनडीए की सरकार बिहार चुनाव के रुझानों में बन रही है। महागठबंधन को भारी हार मिली है। उसे गठबंधन के दलों के आपसी विवाद और सीटों के बंटवारे में असमंजस का सामना करना पड़ा है।
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| बिहार चुनाव 2025 में महागठबंधन की रणनीति बैठक की (फोटो X) |
• बिहार चुनाव के परिणाम — क्या दिखा इस बार?
बिहार की चुनावी लड़ाई के परिणाम लगभग स्पष्ट हैं। यदि रुझान बदल जाए तो एनडीए की सरकार बनेगी। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर देखें आंकड़े। भाजपा ने 94 सीटें जीती हैं। जेडीयू 84 पर। दोनों को मिलाकर बनाई गई सीटें भी बहुमत की सीमा से बहुत दूर हैं।
विपक्ष का सपना टूट गया है। तेजस्वी यादव, जो अपने पिता लालू प्रसाद यादव की तरह बिहार का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं 2005 के बाद से राष्ट्रीय जनता दल ने सत्ता हासिल नहीं की है। 2020 में भी सब कुछ ठीक था।2020 में इन्हें 75 सीटें मिली थी।
• सीटों के हिसाब से कौन कितना जीता, कौन कितना हारा?
इस बार धागा खुल गया। 143 सीटों पर लड़ने वाली राष्ट्रीय जनता दल को सिर्फ 25 सीटें मिलती दिखती हैं। कौन जानता है कि ये भी कम हो जाए।
कांग्रेस महागठबंधन के अन्य दलों में सिर्फ दो सीटों पर सिमटती दिखती है। सीपीआई-माले ने 12 सीटें पिछली बार जीती थीं। इस बार दो मिलने पर भी ठीक है। विकासशील इंसान पार्टी, जो डिप्टी सीएम के उम्मीदवार मुकेश सहनी की पार्टी है, अभी भी खाता नहीं खोला है। CPMM अभी भी एक सीट पर है।
• महागठबंधन की हार के बड़े कारण
अब सवाल उठता है कि महागठबंधन में दो दशक की कथित एंटी-इन्कम्बैंसी होने के बावजूद इस तरह की दुर्गति क्यों हुई? नीतीश-भाजपा का चक्रव्यूह तोड़ने में विपक्ष फिर से असफलता क्यों हुई? हारने वाले लोग इसे अपने-अपने ढंग से समझेंगे। लेकिन, रिपोर्ट के अनुसार, फौरी दृष्टि से कुछ स्पष्ट कारण दिखाई देते हैं।
• SIR कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया
5 नवंबर 2025 को बिहार में पहले चरण की वोटिंग की तैयारी के दौरान, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि हरियाणा चुनाव में 25 लाख वोटों की हेराफेरी हुई है, जिसे उन्होंने "हाइड्रोजन बम" कहा। भाजपा और चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि बिहार के चुनाव में भी ऐसा होगा। उसने इससे पहले SIR चुनाव आयोग की प्रक्रिया, यानी बिहार के विशेष सघन पुनरीक्षण, पर भी सवाल उठाया था।
उन्होंने चुनाव चोरी को मुद्दा बनाकर 17 अगस्त 2025 को बिहार से वोटर अधिकार यात्रा भी निकाली। जो 1 सितंबर 2025 को पटना के गांधी मैदान में 16 दिन (1300 किमी) में खत्म हुआ। कांग्रेस ने आरजेडी का साथ लिया था। तेजस्वी ने इस मुद्दे पर राहुल गांधी का साथ दिया।
लेकिन बिहार चुनाव में दोनों ही पार्टियां SIR को मुद्दा नहीं बना पाईं। कांग्रेस ने अपना अभियान उलट दिया जब इसके कथित "नुकसान" का आभास हुआ। तेजस्वी भी 16 सितंबर 2025 से बिहार अधिकार यात्रा पर निकलने लगे। लेकिन ये सभी प्रयास असफल रहे। यह दांव महागठबंधन पर उल्टा पड़ गया क्योंकि जनता ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, जैसा कि चुनाव के रुझानों से दिखाई देता है।
• तेजस्वी यादव के चुनावी वादे — जनता को क्यों नहीं जम पाए?
महागठबंधन ने अपने घोषणा पत्र को "तेजस्वी प्रण" नाम दिया था। मुख्य समस्या यह थी कि इस घोषणा पत्र से महागठबंधन का आरजेडी-सेंट्रिक व्यवहार स्पष्ट होता था और बाकी दल मद्धम दिखते थे।
इसमें व्यवहारिक वादे नहीं किए गए, जो सबसे बड़ी समस्या थी। तेजस्वी का पूरा जोर नौकरी देने पर था, जो घोषणा पत्र में था। वह भी हर घर में सरकारी काम करती है। लोगों ने कहा कि इतनी सरकारी नौकरियां नहीं हैं, जिन्हें देने का वादा कर रहे हैं। क्या लोगों ने "ब्लूप्रिंट" की मांग करना शुरू किया? इस मांग को तेजस्वी टालते रहे। कहो कि वह जल्दी ही पूरा खाका देंगे कि हर घर में कैसे सरकारी नौकरी मिलेगी।
• कांग्रेस और RJD के बीच तालमेल की कमी
महागठबंधन की छवि को सीट शेयरिंग पर विवाद ने बहुत खराब किया। गठबंधन के दलों ने एक दूसरे के खिलाफ ही उम्मीदवार खड़े कर दिए, हालांकि चुनाव नजदीक आ गए। राजद और कांग्रेस के कार्यकर्ता वैशाली, सिकंदरा, कहलगांव, सुल्तानगंज, नरकटियागंज और वारिसलीगंज की सीटों पर आमने-सामने आ गए।
कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी ने बछवाड़ा, राजापाकर, बिहार शरीफ और करघर में एक दूसरे के खिलाफ प्रत्याशी खड़े कर दिए। जनता में कन्फ्यूजन पैदा हुआ, जो महागठबंधन को भारी नुकसान पहुँचाया।
इसके अलावा, शशिभूषण ने बताया कि महागठबंधन के घटक दलों के बीच तालमेल की कमी हुई। सीट विभाजित करने में जो कुछ हुआ, वह हुआ। दलों के बीच भी चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी एकता नहीं दिखी, जैसी चाहिए थी।
साथ ही, महागठबंधन से बहुत से पिछड़े और दलित लोगों ने राष्ट्रीय जनता दल के यादव समर्थकों का एग्रेशन देखा। एनडीए ने इसका लाभ उठाया।
• महागठबंधन की हार से क्या सीख मिली? अपनी राय कमेंट करके बताए।
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